क्या भारतीय पत्रकारिता अपनी आत्मा खो चुकी है? एक समय था जब अखबार और पत्रकार आम आदमी की आवाज बनकर सत्ता से सवाल पूछते थे। लेकिन आज, क्या खबरें सिर्फ सनसनी और टीआरपी की दौड़ तक सिमट गई हैं? बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे आम आदमी के मुद्दे क्यों गायब हो रहे हैं? आखिर क्यों भारतीय पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों से दूर होती जा रही है? इस गंभीर सवाल का जवाब ढूंढने के लिए, जन सरोकार पत्रिका एक खास विमर्श का आयोजन कर रही है। तो तैयार हो जाइए, क्योंकि ये चर्चा आपके मन में कई सवाल जगा देगी। हमारे साथ बने रहिए!
भारतीय पत्रकारिता का इतिहास गौरवशाली रहा है। आजादी की लड़ाई में समाचार पत्रों ने न सिर्फ जनता को जागरूक किया, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों को भी बेनकाब किया। ‘उदंत मार्तंड’, ‘संवाद कौमुदी’, ‘केसरी’, और ‘प्रताप’ जैसे पत्रों ने समाज को एकजुट करने और सामाजिक सरोकारों को सामने लाने का काम किया। लेकिन आज, 21वीं सदी में, क्या पत्रकारिता उसी रास्ते पर है? या फिर यह कॉरपोरेट हितों, राजनीतिक दबावों, और टीआरपी की चमक-दमक में खो चुकी है?
आज की पत्रकारिता में आम आदमी के मुद्दे जैसे बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, और सामाजिक असमानता कहीं पीछे छूट गए हैं। न्यूज चैनलों और अखबारों में सनसनीखेज खबरें, बॉलीवुड गॉसिप, और राजनीतिक ड्रामे हावी हैं। सवाल यह है कि आखिर क्यों पत्रकारिता समाज के असली सवालों से मुंह मोड़ रही है? क्या यह सिर्फ बाजारवाद का नतीजा है, या फिर इसके पीछे गहरे सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं?
भारत ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों से दूर होती जा रही है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, और श्रीलंका जैसे देशों में भी मीडिया पर कॉरपोरेट और सरकारी दबाव बढ़ रहे हैं। लेकिन भारत में, जहां दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, पत्रकारिता की यह दशा चिंताजनक है। एक समय था जब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता था, लेकिन आज कई लोग इसे सत्ता का मुखपत्र या कॉरपोरेट हितों का साधन मानने लगे हैं।
आम आदमी के मुद्दे गायब होने की कई वजहें हैं। पहला, मीडिया हाउसों का कॉरपोरेटीकरण। बड़े कॉरपोरेट समूहों के स्वामित्व में आने के बाद, न्यूज चैनल और अखबार विज्ञापनदाताओं और राजनीतिक दलों के दबाव में काम करने लगे हैं। दूसरा, टीआरपी की दौड़। सनसनीखेज और भावनात्मक खबरें ज्यादा दर्शक खींचती हैं, जिससे गंभीर मुद्दों को जगह नहीं मिलती। तीसरा, पत्रकारों पर बढ़ता खतरा। कई पत्रकार जो सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं, उन्हें धमकियां, मुकदमे, या हिंसा का सामना करना पड़ता है।
लेकिन क्या पत्रकारिता को फिर से सामाजिक सरोकारों से जोड़ा जा सकता है? क्या हम उस दौर को वापस ला सकते हैं, जब पत्रकारिता समाज की आवाज थी? इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए, दक्षिण एशिया की पहली सामाजिक सवालों की पत्रिका जन सरोकार एक खास विचार-विमर्श का आयोजन कर रही है। इस विमर्श का विषय है – ‘समाज से दूर भारतीय पत्रकारिता की तलाश’।
यह लाइव चर्चा 4 अगस्त 2025, सोमवार को शाम 7 बजे से शुरू होगी। आप इसे जन सरोकार के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं। इस चर्चा में देश के अलग-अलग हिस्सों से अनुभवी पत्रकार और विचारक हिस्सा ले रहे हैं। इनमें शामिल हैं:
- सुशीला पुरी, लखनऊ से
- नवेन्दु, पटना से
- कुमार नरेंद्र सिंह, दिल्ली से
- संध्या नवोदिता, लखनऊ से
- विनोद कुमार, दिल्ली से
- शंभुनाथ चौधरी, रांची से
- और जन सरोकार मैगजीन के संपादक संजय झा, रांची से।
ये सभी विशेषज्ञ भारतीय पत्रकारिता की मौजूदा स्थिति, इसके सामाजिक सरोकारों से दूरी, और इसे फिर से जनता की आवाज बनाने के उपायों पर गहन चर्चा करेंगे। यह विमर्श न सिर्फ पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोगों के लिए, बल्कि हर उस नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है जो एक जागरूक और संवेदनशील समाज चाहता है।
भारतीय पत्रकारिता को फिर से सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की इस पहल में आपकी भागीदारी जरूरी है। यह चर्चा जरूर देखें।
लाइव चर्चा का लिंक यहां दिया हुआ है।
यूट्यूब लिंक – https://youtube.com/live/SO9OZyWpGE4
तारीख – 4 अगस्त 2025, सोमवार, समय – शाम 7 बजे
आइए, मिलकर पत्रकारिता को फिर से समाज की आवाज बनाएं।
