मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब बेहद खतरनाक और विनाशकारी चरण में पहुंच गया है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के भीतर अमेरिकी और इज़रायली वायु सेनाओं ने अब केवल सैन्य ठिकानों ही नहीं, बल्कि नागरिक और आर्थिक ढांचे को भी बड़े पैमाने पर निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इस्फ़हान एयरपोर्ट और होर्मोज़गान के बंदरगाहों समेत कई अहम स्थानों पर भारी बमबारी की खबरें सामने आई हैं।
बताया जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप के सख्त रुख के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। शांति की संभावनाएं लगभग खत्म होती दिख रही हैं और युद्ध अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं।
इस संघर्ष का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब रिहायशी इलाकों और मानवीय सेवाओं से जुड़े ठिकानों पर भी हमले हो रहे हैं। तेहरान स्थित ऐतिहासिक पाश्चर इंस्टीट्यूट, अस्पताल, पुल और स्टील प्लांट जैसे अहम ढांचे भी इस हमले की चपेट में आए हैं। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन और रेड क्रॉस से हस्तक्षेप की अपील की है।
जमीनी हालात बेहद गंभीर हैं। फरवरी के अंत से अब तक हमलों में करीब 2,076 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 26,500 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। वहीं, इज़रायल ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के 40 से अधिक लड़ाकों को मारने का दावा किया है, जिसके जवाब में उत्तरी इज़रायल पर मिसाइल हमले भी किए गए हैं। नवाफ़ सलाम ने देश की स्थिति को बेहद नाजुक बताया है।
इस बीच, अमेरिका के भीतर भी इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड जैसे संस्थानों के 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले जिनेवा कन्वेंशन 1949 के तहत युद्ध अपराध माने जा सकते हैं।
हालांकि, बढ़ते दबाव के बावजूद ईरान की सेना ने पीछे हटने से इनकार कर दिया है और साफ कर दिया है कि वह सरेंडर के बजाय लड़ाई जारी रखेगी। ऐसे में पूरे क्षेत्र में तनाव और तबाही के और बढ़ने की आशंका गहराती जा रही है।

