दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्यालय के आंगन की मिट्टी (जिसे ‘पुण्य माटी’ भी कहा जाता है) लाने की परंपरा के पीछे कई धार्मिक, सामाजिक और पौराणिक कारण हैं. इस मिट्टी के बिना मां दुर्गा की प्रतिमा को अधूरा माना जाता है.

1. पवित्रता और सद्गुणों के संचय की मान्यतासबसे लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, जब कोई पुरुष किसी वेश्यालय (रेड-लाइट एरिया) में प्रवेश करता है, तो वह अपनी तमाम पवित्रता, शुद्धता और अच्छे कर्मों को उस घर की चौखट पर ही छोड़ जाता है. वासना के संसार में कदम रखने से पहले छोड़े गए इन सद्गुणों के कारण उस आंगन की मिट्टी को बेहद पवित्र माना जाता है, क्योंकि उसमें इंसानी अच्छाइयों का वास होता है.
2. सामाजिक समावेश और सम्मान (समावेशी समाज का संदेश)प्राचीन समय से ही वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं को समाज में तिरस्कृत और बहिष्कृत (social pariah) माना जाता रहा है. इस परंपरा की शुरुआत समाज के इस सबसे उपेक्षित तबके को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें सम्मानजनक दर्जा दिलाने के उद्देश्य से की गई थी. यह परंपरा संदेश देती है कि मां दुर्गा की पूजा में समाज के हर वर्ग की भागीदारी अनिवार्य है और मां के दरबार में कोई अछूत नहीं है.
3. नवकन्या (नौ प्रकार की नारियों) की पूजा का नियमहिंदू शास्त्रों और वेदों के अनुसार, दुर्गा पूजा के दौरान ‘नवकन्या’ (नौ अलग-अलग व्यवसायों या पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं) के पूजन का विधान है. इन नौ श्रेणियों में नर्तकी, धोबिन, कपालिन, नाई की पत्नी और वेश्या (गणिका) आदि शामिल हैं. माना जाता है कि इन सभी महिलाओं का सम्मान किए बिना मां दुर्गा की आराधना पूरी नहीं हो सकती.
4. पौराणिक कथा और मां दुर्गा का वरदानएक पौराणिक कथा के अनुसार, एक वेश्या मां दुर्गा की परम भक्त थी. समाज द्वारा उसका घोर तिरस्कार किए जाने पर उसने मां दुर्गा से न्याय की गुहार लगाई.

