और सब ठीक है

सजय झा, एडिटर
साल बदलते रहता है. समय अपनी गति से चलते रहता है. दिन, महीने और तारीख का बदलना तय है. मनुष्य ने अपनी सहूलियत के अनुसार अपने-अपने हिस्से के कलेंडर की तारीख तय कर ली है. समय किसी का इंतजार नहीं करता. जो होना होता है वो समय के भीतर होता है. समय के बाहर कुछ भी नहीं होता. समय अच्छा है, समय खराब है ये सब फालतू किस्म का बकवास है. समय तो बस समय है. सच और झूठ के बीच सदियों से संघर्ष चला आ रहा है. अच्छे और बुरे लोगों ने मिलकर समाज का हित भी किया है और अहित भी. हम एक ऐसे दौर में जी रहे है जहां गलत को ही सही और झूठ को ही सच मान लिया गया है. साफ शब्दों में कहे तो हम सब एक अंधेरगर्द समाज के बस नागरिक भर है. चारों तरफ बूरे और झूठे किस्म के लोगों का वर्चस्व है. झूठ की बादशाहत इतनी मजबूत है कि सच को सच मानने तक से लोग गुरेज कर रहे है. नैतिकता नाम की कोई चीज कहीं दिखाई नहीं देती. बुरे लोगों का बोल बाला समाज के हर तबके में है.
फिर भी समाज के जो अच्छे लोग हैं उनसे उम्मीद बंधती है. वे सब बुरे लोगों से लड़ रहे है. वे सब अच्छे लोगों के लिए झूठ के खिलाफ लड़ते हुए दिखाई देते हैं. यही बात सबसे भरोसे की है. समाज की बेहतर के लिए लड़ता हुआ हर आदमी मुकम्मल एक सच्चा आदमी है. आलम यह है कि आज देश में एक सच्ची और अच्छे आदमी की तलाश सबसे जटील और दुरुह कार्य है. जन सरोकार समाजिक और आर्थिक इंपावरमेंट ट्रस्ट की कोर कमिटी ने देश के कुल 37 सच्चे और अच्छे मुकम्मल आदमी की तलाश में 3 महीने से अधिक समय लगाकर आपसबके सामने जिन शख्सियतों को सामने लाया है हो सकता है आपकी उनसे सहमति ना हो लेकिन जन सरोकार टीम का मानना है कि किसी के मानने या ना मानने से सच को कोई फर्क नहीं पड़ता. सामाजिक बदलाव के ये हमारे 37 नायक देश की एक तरह से धूरी हैं. सामाजिक विकास का पहिया इन नजरों से होकर ही गुजरता है. बहरहाल, 2026 के नए वर्ष की औपचारिक शुभकामनाओं के साथ हम कहना चाहते हैं कि आप अपने आसपास अच्छे और सच्चे लोगों की तलाश करिए. बाकी तो जो है वो ठीक ही है.
