कक्षा 10 से पहले आंचल भाठेजा की आंखों की रौशनी चली गई, लेकिन उन्होंने कभी अपने सपनों को अंधेरे में नहीं जाने दिया. उन्होंने न सिर्फ कक्षा 12 में टॉप किया, बल्कि नेशनल लॉ स्कूल, बेंगलुरु में पहली नेत्रहीन छात्रा बनकर दाखिला लिया और ऑनर्स के साथ ग्रेजुएशन पूरा किया.
अंधेरे से अदालत तक : आंचल भटेजा की असाधारण संघर्षगाथा
आंचल भटेजा ने बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले अपनी आंखों की रोशनी खो दी थी. फिर भी उन्होंने अपने सपनों को जीवित रखने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने अपने साथियों की तुलना में दोगुनी मेहनत की. वैसे तो आंचल जन्म के समय जटिलताओं के कारण कम दृष्टि के साथ ही पैदा हुई थीं. उसके पिता को शुरू में लगा कि वह अपनी शिक्षा जारी नहीं रख पाएगी. शिक्षित होने के बावजूद, वह ये नहीं जानते थे कि उसके लिए आगे का रास्ता क्या है.ऐसे में वो दौर आया जब आंचल 10वीं कक्षा की पढ़ाई कर रही थीं और इसी दौरान बदकिस्मती से उन्होंने अपनी पूरी दृष्टि खो दी. अपनी बेबसी, लाचारी के बीच आंचल को अपने लिए खुद ही एक रास्ता तय करना पड़ा. एक लेखक की सहायता से अपनी परीक्षाएं देने तक, अपनी शिक्षा पूरी करने तक लगातार संघर्ष करती रहीं.
आंचल भटेजा : सुप्रीम कोर्ट में साहस और समानता की ऐतिहासिक जीत…
6 जून 2025 को आंचल ने इतिहास रच दिया, जब वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय में बहस करने वाली पहली नेत्रहीन महिला वकील बनीं. यह सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं थी, बल्कि हर उस सोच को चुनौती थी जो अक्षमता को कमजोरी मानती है. आंचल भटेजा की कहानी बताती है कि दिव्यांगता असमर्थता नहीं होती. यह साहस, जिद और लगातार आगे बढ़ते रहने की कहानी है. उन्होंने साबित कर दिया कि सीमाएं हालात बनाते हैं, इंसान नहीं. आंचल भाठेजा आज लाखों लोगों के लिए उम्मीद और हौसले की मिसाल हैं.

