लेखक: गोपाल झा
भारत की सबसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों में से एक, आईआईएम बैंगलोर अब एक नया अध्याय शुरू करने जा रहा है। वर्ष 2026 से यह संस्थान पहली बार स्नातक (UG) स्तर पर छात्रों को प्रवेश देगा। यह बदलाव भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।
आईआईएम बैंगलोर दो नए चार वर्षीय बी.एससी. (ऑनर्स) प्रोग्राम शुरू करेगा — एक अर्थशास्त्र (Economics) में और दूसरा डेटा साइंस एंड एप्लिकेशंस (Data Science & Applications) में। ये दोनों कोर्स नए विकसित बैनरघट्टा नेशनल पार्क परिसर में संचालित होंगे।
क्यों है यह कदम खास?
यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सोच के अनुरूप है, जिसमें बहु-विषयी शिक्षा, रिसर्च को बढ़ावा और लचीलापन प्रमुख तत्व हैं। छात्र चाहें तो तीन साल बाद स्नातक डिग्री लेकर कोर्स से बाहर हो सकते हैं या चौथे साल तक पढ़ाई करके ऑनर्स डिग्री भी हासिल कर सकते हैं।
कौन कर सकता है आवेदन?
*जिन्होंने कक्षा 11 और 12 में गणित पढ़ा हो
*अधिकतम उम्र 20 साल (आरक्षित वर्ग को 2 साल की छूट)
*चयन एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा से होगा जो दिसंबर 2025 में आयोजित की जाएगी
*परीक्षा में गणित, लॉजिकल रीजनिंग, अंग्रेज़ी और सामान्य ज्ञान से प्रश्न होंगे
*शॉर्टलिस्ट छात्रों का पर्सनल इंटरव्यू भी होगा
कितनी सीटें और कितनी फीस?

शुरुआत में हर कोर्स में 40-40 सीटें होंगी। सालाना फीस ₹8.5 लाख तय की गई है, जिससे चार साल में कुल खर्च करीब ₹34 लाख होगा। आईआईएम बैंगलोर का लक्ष्य है कि 2031 तक UG कोर्स में 640 छात्रों को प्रवेश दिया जाए।
बदल रही है IIMs की दिशा?
आईआईएम बैंगलोर से पहले इंदौर, रोहतक, रांची, जम्मू, बोधगया, अमृतसर और शिलांग जैसे IIM संस्थान IPM (5-वर्षीय प्रोग्राम) के ज़रिए 12वीं के बाद छात्रों को ले रहे हैं। अब बैंगलोर जैसे शीर्ष संस्थान का जुड़ना यह दर्शाता है कि भारत के ये अग्रणी संस्थान अब शुरुआत से ही नेतृत्व की क्षमता को निखारना चाहते हैं।
यह बदलाव केवल अकादमिक विस्तार नहीं है, बल्कि यह संस्थानों की वित्तीय आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक रणनीतिक कदम है — क्योंकि सरकार से मिलने वाला बजट अब सीमित होता जा रहा है।
क्या MBA अब ‘दूसरे नंबर’ का कोर्स बन जाएगा?
अब यह सवाल उठ रहा है कि जब छात्र स्नातक स्तर पर ही IIM जैसी शिक्षा, नेटवर्क और ब्रांड पा सकते हैं, तो क्या भविष्य में MBA की ज़रूरत कम हो जाएगी? हो सकता है छात्र MBA को कुछ वर्षों बाद करें — जैसा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है — या फिर शायद बिल्कुल न करें।
फीस ज़्यादा है, लेकिन तुलना में?
₹8.5 लाख प्रतिवर्ष की फीस ज़रूर ज़्यादा है, लेकिन आज IPM प्रोग्राम और कई निजी विश्वविद्यालयों जैसे अशोका, शिव नादर, ओ.पी. जिंदल, FLAME, NMIMS, Symbiosis की फीस भी लगभग इतनी ही या उससे ज़्यादा है।
अगर हम विदेशों में पढ़ाई की तुलना करें, तो वहां सिर्फ ट्यूशन फीस ही ₹35–40 लाख सालाना होती है — रहने का खर्च अलग। इसके मुकाबले IIM का यह कोर्स गुणवत्ता के साथ भारतीय संदर्भ में एक व्यवहारिक विकल्प बन सकता है।
लेकिन बात साफ है — हर परिवार इतनी फीस नहीं दे सकता। इसलिए ज़रूरी है कि IIMB स्कॉलरशिप और फाइनेंशियल ऐड की मजबूत व्यवस्था करे, ताकि योग्यता ही चयन का आधार बने, पैसा नहीं।
क्या यह भारत का अपना ‘Ivy League UG मॉडल’ बन सकता है?
अगर इस कोर्स को सही दिशा और संसाधन मिले — जैसे बढ़िया फैकल्टी, विविधता, रिसर्च का माहौल, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर और ज़रूरत आधारित आर्थिक सहायता — तो यह भारत का एक ऐसा UG मॉडल बन सकता है जो दुनिया के टॉप UG कोर्स को टक्कर दे।
यह कदम सिर्फ कोर्स शुरू करने का नहीं है, बल्कि भारत में UG शिक्षा को नया आकार देने का है।

