
संजय झा
प्रधान संपादक
लाठी पर लोकतंत्र!
लोकतंत्र को लाठी में लटकाए, भागे जा रहे हैं सभी सीना फुलाये. जरा ठहरिये, मेरे देश के हुक्मरानों. देश के समाज के मेरी जान जनप्रतिनिधियों. मालूम है आप सबको कि संसद और विधानसभा में कितने प्रतिशत आप शातिर अपराधी माननीय बनकर आम जनता की छाती पर चढ़कर लोकतंत्र की बर्बादी की कहानी लिख रहे हो? थोड़ी शर्म कराे. थोड़ी दया करो. घिन्न आती है आप सभी क्रिमिनल सांसद और विधायकों के बारे में बात करते हुए. समाज के अक्स-अक्स में आप सभी छंटे हुए अपराधी नेताओं की कहानियां बिखरी हुई है. लूट, हत्या, रेप, फिरौती, ठेकापट्टी, बम-बंदूक, जातिय हिंसा जिस किसी जनप्रतिनिधियों का धंधा हो हमारे जैसे लोग ना तो उन्हें गुंडा मानते हैं ना नेता मानते हैं. जिस देश में लोकतंत्र के नाम पर अपराध की फसलें लहलहा रही हो वहां न्याय की तलाश बालू में सूई खोजने की तरह है. आलम ये है कि गली मुहल्ले, गांव-टोला, शहर-महानगर हर जगह अपराधी नेताओं का जमघट इस बात की गवाही है कि जनतंत्र के नाम पर लूट की खुली छूट की शानदार परंपरा एक विरासत के तौर पर चली आ रही है.
हर जगह धुआं-धुआं है. हर जगह कोहरा और कुहासा है. हर जगह सवाल दर सवाल है. दोष आप सब गुंडे सांसद और विधायकों का नहीं है. दोष तो सिस्टम का है. ये जो सिस्टम है और जो इसे चलाने का दावा करते हैं, सवाल उनकी नीयत पर है. हर दल अपराध का एक दलदल है. जनतंत्र के जंगल में अपराधी सांसद और विधायकों को हर तरह की खुली छूट है. कारण कि लोकतंत्र के हम्माम में सभी नंगे हैं. देश में जनतंत्र को तमाशे में इस तरह तब्दील कर दिया गया है कि मदारी की भाषा ही यहां सबकुछ है. झूठ, फरेब, हिंसा, तिकड़म, शोषण, दमन, उत्पीड़न लोकतंत्र की मूल आत्मा बना दी गई है.यही कारण है कि हर दल के घडि़याली आंसू बहाने वाले नेताओं को हर जाति के गुंडों से कोई परहेज नहीं. कल गली का कौन सा गुंडा सांसद विधायक बनकर कब मंत्री बन जाये इसकी कोई गारंटी नहीं. बस गारंटी है तो अवाम के जगने का. अवाम के उठने का. आज नहीं तो कल आपसभी माननीय अपराधी सांसद, विधायक के खिलाफ समाज के हर वर्ग के लोग खड़े होंगे, इसकी पूरी गारंटी है. फिलहाल आपलोग सत्ता का गंगा स्नान कीजिए. मैं जरा एक गाना गुनगुना लूं कि -गोली मारो भेजे में एै भेजा शोर करता है…

